चालीसा
श्री विष्णु चालीसा
परिचय
पालनकर्ता विष्णु को समर्पित प्रचलित चालीसा का संपूर्ण पाठ, प्रत्येक पंक्ति के अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ सहित। यह पाठ प्रचलित मुद्रित (गीता प्रेस) परंपरा के अनुसार है; सुंदरदास की एक अन्य विष्णु-चालीसा भी प्रचलित है। संस्करणों में वर्तनी के छोटे अंतर मिल सकते हैं।
आरंभिक दोहा
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय॥
पाठ
नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥
आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥
हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥
सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
अर्थ
खर के शत्रु, कष्ट नाशने वाले, सर्वत्र विचरने वाले विष्णु भगवान को नमस्कार।
जगत में आपकी शक्ति प्रबल है; त्रिभुवन में उजियारा फैला है।
सुंदर रूप, मनोहर सूरत, सरल स्वभाव, मोहने वाली मूरत।
तन पर पीतांबर अत्यंत शोभता है; वैजयंती माला मन मोहती है।
हाथों में शंख-चक्र-गदा विराजते हैं; देखकर दैत्य-असुर दल भागते हैं।
जहाँ सत्य-धर्म की गर्जना हो, वहाँ मद-लोभ नहीं ठहरते; काम-क्रोध-मद-लोभ शोभा नहीं देते।
संत-भक्त-सज्जनों के मन को प्रसन्न करने वाले; दनुज-असुर-दुष्टों के दल का नाश करने वाले।
सुख उपजाते, सब कष्ट तोड़ते, दोष मिटाकर जन को सज्जन बनाते हो।
पाप काटकर भवसागर से पार उतारते, कष्ट मिटाकर भक्तों का उद्धार करते हो।
प्रभु अनेक रूप केवल भक्ति के कारण धारण करते हैं।
जब धरती गाय बनकर पुकार उठी, तब आपने राम का रूप धरा।
भार उतारकर असुर दल मारा; रावण आदि का संहार किया।
आपने वराह रूप बनाया और हिरण्याक्ष को मार गिराया।
मत्स्य तन धरकर समुद्र मथा और चौदह रत्न निकलवाए।
जब असंख्य असुरों में द्वंद्व मचा, तब आपने मोहिनी रूप दिखाया।
देवताओं को अमृत पिलाया और असुरों को छवि से बहलाया।
कूर्म रूप धरकर समुद्र मथा और मंदराचल पर्वत तुरंत उठाया।
शंकर का फंदा छुड़ाया और भस्मासुर को रूप दिखाया।
जब असुरों ने वेद डुबो दिए, तब प्रबंध करके उन्हें ढुँढवाया।
मोहित बनकर दुष्ट को नचाया और उसी के हाथ से उसे भस्म कराया।
असुर जलंधर अत्यंत बलवान था; उसने शंकर से भी लड़ाई की।
शिव की हार तय जान पड़ी; तब दुष्ट ने सती से छल किया।
शिवरानी ने आपका स्मरण किया और सारी विपत्ति-कथा सुनाई।
तब आप ज्ञानी मुनीश्वर बने और वृंदा की सारी सुधि भुला दी।
दानवों की शैतानी देखकर वृंदा आईं और आपसे लिपट गईं।
स्पर्श को धर्म-क्षति मानकर शिव ने उस असुर का वध किया।
ध्रुव-प्रह्लाद को उबारा; हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों को मारा।
गणिका और अजामिल को तारा; बहुत भक्तों को भवसागर से पार उतारा।
हमारे सारे संताप हरो; कृपा करो हे हरि, सृजन के स्वामी।
मैं आपके दर्शन पाऊँ; हे दीनबंधु, भक्तों के हितकारी।
आपका सेवक दर्शन चाहता है; दया करो हे मधुसूदन।
मैं योग्य जप-पूजन नहीं जानता; न यज्ञ, न स्तुति, न अनुष्ठान।
शील-दया-संतोष-सुलक्षण मुझे ज्ञात नहीं; व्रत-बोध की विलक्षणता नहीं जानता।
आपकी पूजा किस विधि करूँ? अपनी कुमति देखकर भीषण दुख होता है।
प्रणाम किस विधि करूँ, स्मरण कैसे करूँ, समर्पण किस भाँति करूँ?
सुर-मुनि सदा आपकी सेवा करते हैं और परमगति पाकर हर्षित रहते हैं।
दीन-दुखियों के सदा सहायक हो; अपनों को अपना जानकर अपना लेते हो।
मेरे पाप-दोष-संताप नष्ट करो; भव-बंधन से मुक्त कराओ।
सुख-संपत्ति देकर सुख उपजाओ; मुझे अपने चरणों का दास बनाओ।
वेद सदा यही विनय सुनाते हैं; जो पढ़े-सुने, वह सुख पाए।