आरती
श्री गणपति जी की आरती
परिचय
“गणपति की सेवा मंगल मेवा” — श्री गणपति की प्रचलित आरती। मुखड़ा हर छंद के बाद दोहराया जाता है। प्रत्येक छंद के नीचे सरल अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ दिया गया है। क्षेत्रों और परिवारों में शब्द और धुन भिन्न हो सकते हैं।
पाठ
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरैं। तीन लोक के सकल देवता, द्वार खड़े नित अर्ज करैं॥
रिद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजें, अरु आनन्द सों चमर करैं। धूप-दीप अरू लिए आरती भक्त खड़े जयकार करैं॥
गुड़ के मोदक भोग लगत हैं मूषक वाहन चढ्या सरैं। सौम्य रूप को देख गणपति के विघ्न भाग जा दूर परैं॥
भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी दिन दोपारा दूर परैं। लियो जन्म गणपति प्रभु जी दुर्गा मन आनन्द भरैं॥
अद्भुत बाजा बजा इन्द्र का देव बंधु सब गान करैं। श्री शंकर के आनन्द उपज्या नाम सुन्यो सब विघ्न टरैं॥
आनि विधाता बैठे आसन, इन्द्र अप्सरा नृत्य करैं। देख वेद ब्रह्मा जी जाको विघ्न विनाशक नाम धरैं॥
एकदन्त गजवदन विनायक त्रिनयन रूप अनूप धरैं। पगथंभा सा उदर पुष्ट है देव चन्द्रमा हास्य करैं॥
दे शराप श्री चन्द्रदेव को कलाहीन तत्काल करैं। चौदह लोक में फिरें गणपति तीन लोक में राज्य करैं॥
उठि प्रभात जप करैं ध्यान कोई ताके कारज सर्व सरैं। पूजा काल आरती गावैं ताके शिर यश छत्र फिरैं॥
गणपति की पूजा पहले करने से काम सभी निर्विघ्न सरैं। सभी भक्त गणपति जी के हाथ जोड़कर स्तुति करैं॥
अर्थ
गणपति की सेवा ही मंगल-मेवा है; सेवा से सब विघ्न दूर हो जाते हैं। तीनों लोकों के सभी देवता उनके द्वार पर खड़े होकर नित्य प्रार्थना करते हैं।
दाएँ-बाएँ ऋद्धि-सिद्धि विराजमान रहती हैं और आनंद से चमर झलकाती हैं; भक्त धूप-दीप और आरती लिए खड़े होकर जयकार करते हैं।
गुड़ के मोदक भोग में लगते हैं और मूषक-वाहन पर चढ़कर जाते हैं; गणपति के सौम्य रूप को देखते ही विघ्न दूर भाग जाते हैं।
भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को दोपहर में विघ्न दूर हो जाते हैं; भगवान गणपति ने जन्म लिया और माता दुर्गा का मन आनंद से भर उठा।
इंद्र का अद्भुत बाजा बजता है और सभी देव बंधु गान करते हैं; शंकर के आनंद से उपजा नाम सुनते ही सब विघ्न टल जाते हैं।
विधाता आकर आसन पर बैठते हैं और इंद्र-अप्सराएँ नृत्य करती हैं; ब्रह्माजी और वेद उन्हें देखकर उनका नाम विघ्न-विनाशक धारण करते हैं।
एकदंत, गजवदन विनायक अनूप तीन नेत्रों का रूप धारण करते हैं; उनका पुष्ट उदर पैरों पर टिका है और चंद्रमा देव मुस्कुराते हैं।
उन्होंने श्री चंद्रदेव को शाप देकर तत्काल कलाहीन कर दिया; गणपति चौदह लोकों में विचरते हैं और तीनों लोकों में राज्य करते हैं।
जो प्रातः उठकर जप-ध्यान करता है, उसके सभी कारज सिद्ध होते हैं; जो पूजा-काल में आरती गाता है, उसके शिर पर यश का छत्र घूमता है।
गणपति की पूजा सबसे पहले करने से सभी काम निर्विघ्न पूरे होते हैं; सभी भक्त हाथ जोड़कर गणपति जी की स्तुति करते हैं।