स्तोत्र
नाग स्तोत्रम्
परिचय
नाग देवताओं की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। नाग पंचमी पर नाग-स्मरण की विशेष परंपरा है। पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं।
पाठ
ब्रह्मलोके च ये सर्पाः शेषनागाः पुरोगमाः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ १॥
विष्णुलोके च ये सर्पाः वासुकिप्रमुखाश्च ये । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ २॥
रुद्रलोके च ये सर्पाः तक्षकः प्रमुखास्तथा । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ३॥
खाण्डवस्य तथा दाहे स्वर्गं च ये च समाश्रिताः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ४॥
सर्पसत्रे च ये सर्पाः आस्तीकेनाभिरक्षिताः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ५॥
प्रलये चैव ये सर्पाः कार्कोटप्रमुखाश्च ये । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ६॥
धर्मलोके च ये सर्पाः वैतरण्यां समाश्रिताः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ७॥
ये सर्पाः पर्वतेषु धारिसन्धिषु संस्थिताः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ८॥
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पाः प्रचरन्ति च । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ९॥
पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये सर्पा बिलसंस्थिताः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ १०॥
रसातले च ये सर्पाः अनन्तादिमहाबलाः । नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ ११॥
अर्थ
ब्रह्मलोक में जो सर्प हैं, जिनके अग्रणी शेषनाग हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
विष्णुलोक में जो सर्प हैं, जिनमें वासुकि प्रमुख हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
रुद्रलोक में जो सर्प हैं, जिनमें तक्षक प्रमुख हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
खाण्डव वन के दाह के समय जो (बचकर) स्वर्ग में जा बसे — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
(जनमेजय के) सर्प-यज्ञ में जो सर्प आस्तीक मुनि द्वारा बचाये गये — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
प्रलय में भी जो सर्प रहते हैं, जिनमें कर्कोटक प्रमुख हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
धर्मराज (यम) के लोक में जो सर्प वैतरणी नदी के आश्रय में रहते हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
जो सर्प पर्वतों की कन्दराओं और दर्रों में स्थित हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
गाँव में अथवा वन में जो सर्प विचरते हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
पृथ्वी पर जो सर्प हैं और जो बिलों में रहते हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।
रसातल में जो अनन्त आदि महाबली सर्प हैं — उन्हें नमस्कार; वे मुझ पर सदा सुप्रसन्न और प्रसन्न रहें।