भक्ति पाठ
अगस्त्य सरस्वती स्तोत्रम्
ऋषि अगस्त्य से जुड़ी परंपरा में सरस्वती की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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ऋषि अगस्त्य से जुड़ी परंपरा में सरस्वती की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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ऋण से मुक्ति की कामना के साथ श्री गणेश की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। विद्यार्थियों और साधकों में इसका पाठ प्रचलित है। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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मंगल ग्रह की कृपा से ऋण-मोचन की कामना में रचित स्तोत्र का परिचय। मंगलवार को इसका पाठ विशेष प्रचलित है। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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ऋण हरने वाले गणेश की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। गणेश को समर्पित ऋण-मोचन विषयक एक से अधिक स्तोत्र प्रचलित हैं; पाठ अपनी परंपरा के अनुसार समझें।
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भगवान हरि (विष्णु) की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। “जगज्जालपालम्” से आरंभ होने वाला प्रसिद्ध हरि-स्तोत्र इसी परंपरा का है। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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धनलक्ष्मी — धन और समृद्धि की दात्री लक्ष्मी — की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं।
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वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में ऋषि अगस्त्य द्वारा श्रीराम को दिए गए सूर्य-स्तुति उपदेश का परिचय। रविवार और युद्ध-पूर्व स्मरण की परंपरा से यह जुड़ा है। पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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हनुमान जी को समर्पित वडवानल (बड़वानल) स्तोत्र का परिचय। परंपरा के अनुसार यह विभीषण द्वारा रचित माना जाता है। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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माँ लक्ष्मी की स्तुति में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाने वाला प्रसिद्ध स्तोत्र। कथा के अनुसार निर्धन महिला के घर स्वर्ण-वर्षा से यह जुड़ा है। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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श्रीराम के रक्षा-कवच के रूप में प्रसिद्ध स्तोत्र का परिचय। परंपरा के अनुसार इसकी रचना बुधकौशिक ऋषि ने स्वप्न में प्राप्त मंत्र से की। संस्कृत पाठ विश्वसनीय संस्करण से मिलाएँ।
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लक्ष्मी के आठ रूपों (आदि, धन, धान्य, गज, संतान, वीर, विजय, विद्या) की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं।
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शिव और राम दोनों की एक साथ स्तुति करने वाले इस स्तोत्र का परिचय। हरि-हर एकता की भक्ति-परंपरा से यह जुड़ा है; प्रत्येक पद "शिव हरे विजयं कुरु मे वरम्" की टेक पर समाप्त होता है। पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं।
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दुर्गा के नौ रूपों (शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक) की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। नवरात्रि के नौ दिनों से यह विशेष जुड़ा है। पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं।
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