स्तोत्र
ऋणहर्ता श्री गणेश स्तोत्रम्
परिचय
ऋण हरने वाले गणेश की स्तुति में रचित स्तोत्र का परिचय। गणेश को समर्पित ऋण-मोचन विषयक एक से अधिक स्तोत्र प्रचलित हैं; पाठ अपनी परंपरा के अनुसार समझें।
पाठ
कैलाशपर्वते रम्ये शम्भुं चन्द्रार्धशेखरम् । षडाम्नायसमायुक्तं पप्रच्छ नगकन्यका ॥ १॥
देवेश परमेशानसर्वशास्त्रार्थपारग । उपायमृणनाशस्य कृपया वद साम्प्रतम् ॥ २॥
सम्यक् पृष्टं त्वया भद्रे लोकानां हितकाम्यया । तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय ॥ ३॥
सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् । ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ॥
सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक्पूजितः फलसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ १॥
त्रिपुरस्य वधात्पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ २॥
हिरण्यकशिप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ३॥
महिषस्य वधे देव्या गणनाथः प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ४॥
तारकस्य वधात्पूर्वं कुमारेण प्रपूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ५॥
भास्करेण गणेशस्तु पूजितश्छविसिद्धये । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ६॥
शशिना कान्तिवृद्ध्यर्थं पूजितो गणनायकः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ७॥
पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजितः । सदैव पार्वतीपुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥ ८॥
इदं त्वृणहरं स्तोत्रं तीव्रदारिद्र्यनाशनम् । एकवारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं समाहितः ॥ ९॥
दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेरसमतां व्रजेत् । फडन्तोऽयं महामन्त्रः सार्धपञ्चदशाक्षरः ॥ १०॥
ॐ गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः फट् ॥
अस्यैवायुतसङ्ख्याभिः पुरश्चरणमीरितम् । सहस्रावर्तनात् सद्यो वाञ्छितं लभते फलम् ॥ ११॥
भूतप्रेतपिशाचानां नाशनं स्मृतिमात्रतः ॥ १२॥
अर्थ
रमणीय कैलास पर्वत पर, मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, छहों आम्नायों (शास्त्र-परम्पराओं) से युक्त शम्भु से पर्वत-कन्या पार्वती ने पूछा —
हे देवेश, परमेश्वर, समस्त शास्त्रों के अर्थ के पारगामी! ऋण के नाश का उपाय अभी कृपा करके बताइए।
हे भद्रे! लोगों के हित की कामना से तुमने उत्तम प्रश्न किया है; मैं वह सब कहता हूँ — सावधान होकर सुनो।
सिन्दूर-वर्ण के, दो भुजाओंवाले, लम्बोदर, कमल-दल पर विराजमान, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित और सिद्धों से घिरे उन गणेश देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने फल-सिद्धि के लिए जिनकी भली-भाँति पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
त्रिपुर के वध से पहले शम्भु ने जिनकी भली-भाँति अर्चना की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
हिरण्यकशिपु आदि के वध के लिए विष्णु ने जिनकी अर्चना की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
महिषासुर के वध के समय देवी (दुर्गा) ने जिन गणनाथ की पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
तारकासुर के वध से पहले कुमार (कार्तिकेय) ने जिनकी पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
भास्कर (सूर्य) ने अपनी कान्ति की सिद्धि के लिए जिन गणेश की पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
चन्द्रमा ने अपनी कान्ति की वृद्धि के लिए जिन गणनायक की पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
अपनी तपस्या की रक्षा के लिए विश्वामित्र ने जिनकी पूजा की — वे पार्वतीपुत्र (गणेश) सदा मेरे ऋण का नाश करें।
यह ऋणहर स्तोत्र तीव्र दरिद्रता का नाश करनेवाला है; जो एकाग्रचित्त होकर एक वर्ष तक प्रतिदिन एक बार इसका पाठ करे —
— वह दारुण दरिद्रता छोड़कर कुबेर के समान (धनवान) हो जाता है। "फट्" पर समाप्त होनेवाला यह महामन्त्र साढ़े पन्द्रह अक्षरों का है।
"ॐ गणेश! ऋण को काट दीजिए, हे वरेण्य! हुं नमः फट्" — यह मूल मन्त्र है।
इसी मन्त्र का दस सहस्र (अयुत) संख्या में पुरश्चरण कहा गया है; सहस्र आवृत्तियों से ही साधक शीघ्र मनचाहा फल पा लेता है।
इसके स्मरण मात्र से भूत, प्रेत और पिशाचों का नाश हो जाता है।