चालीसा

रामदेव पीर नी चालीसा

परिचय

राजस्थान और गुजरात में पूजित लोकदेवता रामदेव पीर को समर्पित प्रचलित चालीसा का संपूर्ण पाठ, प्रत्येक पंक्ति के अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ सहित। यह पाठ प्रचलित मुद्रित परंपरा के अनुसार है; संस्करणों में वर्तनी के छोटे अंतर मिल सकते हैं।

पाठ

जय जय रामदेव सुर राया। अजमल पुत्र अनोखी माया॥

विष्णु रूप सुर नर के स्वामी। परम प्रतापी अन्तर्यामी॥

ले अवतार अवनि पर आये। तंवर वंश अवतंश कहाये॥

संत जनों के कारज सारे। दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥

परच्या प्रथम पिता को दीन्हा। दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥

कुमकुम पद पोली दर्शाये। ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥

परचा दूजा जननी पाया। दूध उफणता चरा उठाया॥

परचा तीजा पुरजन पाया। चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥

परच्या चौथा भैरव मारा। भक्त जनों का कष्ट निवारा॥

पंचम परच्या रतना पाया। पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥

परच्या छठा विजयसिंह पाया। जला नगर शरणागत आया॥

परच्या सप्तम् सुगना पाया। मुवा पुत्र हंसता भग आया॥

परच्या अष्टम् बौहित पाया। जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥

भंवर डूबती नाव उबारी। प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥

नवमां परच्या वीरम पाया। बनियां आ जब हाल सुनाया॥

दसवां परच्या पा बिनजारा। मिश्री बनी नमक सब खारा॥

परच्या ग्यारह किरपा थारी। नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥

परच्या द्वादश ठोकर मारी। निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥

परच्या तेरहवां पीर परी पधारया। ल्याय कटोरा कारज सारा॥

चौदहवां परच्या जाभो पाया। निजसर जल खारा करवाया॥

परच्या पन्द्रह फिर बतलाया। राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥

परच्या सोलह हरबू पाया। दर्श पाय अतिशय हरषाया॥

परच्या सत्रह हर जी पाया। दूध थणा बकरया के आया॥

सुखी नाडी पानी कीन्हों। आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥

परच्या अठारहवां हाकिम पाया। सूते को धरती लुढ़काया॥

परच्या उन्नीसवां दल जी पाया। पुत्र पाय मन में हरषाया॥

परच्या बीसवां पाया सेठाणी। आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥

तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा। उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥

परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया। हो अन्धा करनी फल पाया॥

परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां। सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥

परच्या तेईसवां बादशाह पाया। फेर भक्त को नहीं सताया॥

परच्या चैबीसवां बख्शी पाया। मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥

जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां। तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥

भक्त टेर सुन आतुर धाते। चढ़ लीले पर जल्दी आते॥

जो जन प्रभु की लीला गावें। मनवांछित कारज फल पावें॥

यह चालीसा सुने सुनावे। ताके कष्ट सकल कट जावे॥

जय जय जय प्रभु लीला धारी। तेरी महिमा अपरम्पारी॥

मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ। कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥

नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा। मती अनुसार रची चालीसा॥

दास सभी शरण में तेरी। रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥

अर्थ

जय-जय रामदेव सुर-राया; अजमल-पुत्र, अनोखी माया वाले।

विष्णु रूप, सुर-नर के स्वामी; परम प्रतापी अंतर्यामी।

अवतार लेकर पृथ्वी पर आए; तंवर वंश के अलंकार कहाए।

संतजनों के कार्य सँवारे; दानव-दैत्य-दुष्ट संहारे।

पहला परचा पिता को दिखाया — परिंडे(?) में दूध किया।

कुमकुम चरण आँगन में दिखाए, ज्यों ही प्रभु पालने में प्रकट हुए।

दूसरा परचा माता ने पाया — उफनता दूध ... उठाया।

तीसरा परचा पुरजनों ने पाया — चिथड़ों का घोड़ा सजीव हुआ।

चौथा परचा — भैरव मारा; भक्तों का कष्ट निवारा।

पाँचवाँ परचा रतना ने पाया — पुंगल(?) जाकर प्रभु ने फंद छुड़ाया।

छठा परचा विजयसिंह ने पाया — जला नगर शरणागत आया।

सातवाँ परचा सुगना ने पाया — मरा पुत्र हँसता हुआ आया।

आठवाँ परचा व्यापारी ने पाया — परदेश जाकर बहुत धन लाया।

भँवर में डूबती नाव उबारी; टेर सुनकर अवतारी पहुँचे।

नवाँ परचा वीरम ने पाया, जब बनिये ने आकर हाल सुनाया।

दसवाँ परचा बंजारे ने पाया — मिश्री नमक जैसी खारी हुई।

ग्यारहवाँ परचा तुम्हारी कृपा से — नमक फिर मिश्री हो गया।

बारहवाँ परचा — ठोकर मारकर प्यारी ... नाड़ी बनाई।

तेरहवाँ परचा — पीर-परी (?) पधारे; कटोरा लाकर कार्य सारा।

चौदहवाँ परचा जाभो(?) ने पाया — अपने सरोवर का जल खारा करवाया।

पंद्रहवाँ परचा फिर बताया गया — प्रभु ने राम-सरोवर खुदवाया।

सोलहवाँ परचा हरबू ने पाया; दर्शन पाकर अति हर्षाया।

सत्रहवाँ परचा हरजी(?) ने पाया — बकरियों के थनों में दूध आया।

सूखी नाड़ी में पानी किया; हरजी ने आत्मज्ञान दिया।

अठारहवाँ परचा हाकिम ने पाया — सोते को धरती पर लुढ़काया।

उन्नीसवाँ परचा दलजी(?) ने पाया — पुत्र पाकर मन में हर्षाया।

बीसवाँ परचा सेठानी ने पाया — प्रभु आए, गद्गद वाणी सुनकर।

तुरंत सेठ को जीवित किया; प्रकट अभय वर दिया।

इक्कीसवाँ परचा — चोर अंधा हुआ, करनी का फल पाया।

बाईसवाँ परचा मीर(?) ने देखा — सात तवे प्रभु ने बेधे।

तेईसवाँ परचा बादशाह ने पाया — फिर भक्तों को नहीं सताया।

चौबीसवाँ परचा बख्शी(?) ने पाया — मरा पुत्र पल भर में उठ दौड़ा।

जब-जब जिसने स्मरण किया, तब-तब आकर तुमने दर्शन दिए।

भक्तों की टेर सुनकर आतुर दौड़ते हो; लीले (घोड़े) पर चढ़कर शीघ्र आते हो।

जो प्रभु की लीला गाते हैं, वे मनवांछित कार्य-फल पाते हैं।

जो यह चालीसा सुनता-सुनाता है, उसके समस्त कष्ट कट जाते हैं।

जय-जय-जय लीला-धारी प्रभु; तुम्हारी महिमा अपार है।

मैं मूर्ख तुम्हारे गुण क्या गाऊँ? शारदा जैसी बुद्धि कहाँ से लाऊँ?

बुद्धि-बल का लेशमात्र नहीं है; मति अनुसार चालीसा रची है।

सब दास तुम्हारी शरण में हैं; हे प्रभु, मेरी लाज रखो।