चालीसा
कृष्ण चालीसा (द्वितीय पाठ)
परिचय
बाल-कृष्ण (गोपाल) को समर्पित प्रचलित चालीसा का संपूर्ण पाठ, प्रत्येक पंक्ति के अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ सहित। यह श्री कृष्ण चालीसा (“बंशी शोभित”) और कृष्ण चालीसा (“बांके बिहारी”) से भिन्न रचना है। संस्करणों में वर्तनी के छोटे अंतर मिल सकते हैं।
पाठ
जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी। दुष्ट दलन लीला अवतारी॥
जो कोई तुम्हरी लीला गावै। बिन श्रम सकल पदारथ पावै॥
श्री वसुदेव देवकी माता। प्रकट भये संग हलधर भ्राता॥
मथुरा सों प्रभु गोकुल आये। नन्द भवन में बजत बधाये॥
जो विष देन पूतना आई। सो मुक्ति दै धाम पठाई॥
तृणावर्त राक्षस संहार्यौ। पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ॥
खेल खेल में माटी खाई। मुख में सब जग दियो दिखाई॥
गोपिन घर घर माखन खायो। जसुमति बाल केलि सुख पायो॥
ऊखल सों निज अंग बँधाई। यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई॥
बका असुर की चोंच विदारी। विकट अघासुर दियो सँहारी॥
ब्रह्मा बालक वत्स चुराये। मोहन को मोहन हित आये॥
बाल वत्स सब बने मुरारी। ब्रह्मा विनय करी तब भारी॥
काली नाग नाथि भगवाना। दावानल को कीन्हों पाना॥
सखन संग खेलत सुख पायो। श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो॥
चीर हरन करि सीख सिखाई। नख पर गिरवर लियो उठाई॥
दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों। राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों॥
नन्दहिं वरुण लोक सों लाये। ग्वालन को निज लोक दिखाये॥
शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई। अति सुख दीन्हों रास रचाई॥
अजगर सों पितु चरण छुड़ायो। शंखचूड़ को मूड़ गिरायो॥
हने अरिष्टा सुर अरु केशी। व्योमासुर मार्यो छल वेषी॥
व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये। मारि कंस यदुवंश बसाये॥
मात पिता की बन्दि छुड़ाई। सान्दीपनि गृह विद्या पाई॥
पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी। प्रेम देखि सुधि सकल भुलानी॥
कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी। हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी॥
भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये। सुरन जीति सुरतरु महि लाये॥
दन्तवक्र शिशुपाल संहारे। खग मृग नृग अरु बधिक उधारे॥
दीन सुदामा धनपति कीन्हों। पारथ रथ सारथि यश लीन्हों॥
गीता ज्ञान सिखावन हारे। अर्जुन मोह मिटावन हारे॥
केला भक्त बिदुर घर पायो। युद्ध महाभारत रचवायो॥
द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो। गर्भ परीक्षित जरत बचायो॥
कच्छ मच्छ वाराह अहीशा। बावन कल्की बुद्धि मुनीशा॥
ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो। राम रुप धरि रावण मार्यो॥
जय मधु कैटभ दैत्य हनैया। अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया॥
ब्याध अजामिल दीन्हें तारी। शबरी अरु गणिका सी नारी॥
गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन। देहु दरश ध्रुव नयनानन्दन॥
देहु शुद्ध सन्तन कर सङ्गा। बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रङ्गा॥
देहु दिव्य वृन्दावन बासा। छूटै मृग तृष्णा जग आशा॥
तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद। शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद॥
जय जय राधारमण कृपाला। हरण सकल संकट भ्रम जाला॥
बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी। जो सुमरैं जगपति गिरधारी॥
समापन दोहा
गोपाल चालीसा पढ़े नित, नेम सों चित्त लावई। सो दिव्य तन धरि अन्त महँ, गोलोक धाम सिधावई॥
अर्थ
पूर्ण ब्रह्म बिहारी की जय-जय; लीला से दुष्टों का दलन करने वाले अवतार।
जो तुम्हारी लीला गाता है, वह बिना श्रम सब पदार्थ पाता है।
श्री वसुदेव-देवकी माता से हलधर भ्राता सहित प्रकट हुए।
मथुरा से प्रभु गोकुल आए; नंद भवन में बधाइयाँ बजीं।
जो विष देने पूतना आई, उसे मुक्ति देकर धाम भेजा।
तृणावर्त राक्षस संहारा; पग बढ़ाकर शकटासुर मारा।
खेल-खेल में माटी खाई; मुख में सारा जग दिखाया।
गोपियों के घर-घर माखन खाया; बाल-केलि से यशोदा को सुख दिया।
ऊखल से अंग बँधाकर यमलार्जुन को जड़ योनि से छुड़ाया।
बकासुर की चोंच फाड़ी; विकट अघासुर का संहार किया।
ब्रह्मा ने बालक-बछड़े चुराए; मोहन को मोहित करने आए।
मुरारी स्वयं सब बाल-वत्स बने; तब ब्रह्मा ने भारी विनती की।
काली नाग को नाथा, भगवान ने; दावानल का पान किया।
सखाओं संग खेलकर सुख पाया; श्रीदामा को कंधे पर चढ़ाया।
चीर हरकर सीख सिखाई; नख पर गिरिवर उठा लिया।
यज्ञ-पत्नियों को दर्शन दिया; राधा के प्रेम-सुधा का सुख लिया।
नंद को वरुण लोक से लाए; ग्वालों को अपना लोक दिखाया।
शरद-चंद्र देखकर वेणु बजाई; रास रचाकर अति सुख दिया।
अजगर से पिता के चरण छुड़ाए; शंखचूड़ का सिर गिराया।
अरिष्टासुर और केशी मारे; छलवेशी व्योमासुर को मारा।
व्याकुल ब्रज छोड़कर मथुरा आए; कंस मारकर यदुवंश बसाया।
माता-पिता की कैद छुड़ाई; सांदीपनि के घर विद्या पाई।
फिर ज्ञानी ऊधव को ब्रज भेजा; प्रेम देखकर सारी सुध भूल गए।
कुब्जा को सुंदर नारी बनाया; हरि सुकुमारी रुक्मिणी लाए।
भौमासुर मारकर भक्त छुड़ाए; देवों को जीतकर कल्पवृक्ष पृथ्वी पर लाए।
दंतवक्त्र-शिशुपाल संहारे; खग-मृग, नृग और बहेलियों का उद्धार किया।
दीन सुदामा को धनपति बनाया; पार्थ के रथ के सारथि बनकर यश लिया।
गीता-ज्ञान सिखाने वाले; अर्जुन का मोह मिटाने वाले।
भक्त विदुर के घर केले पाए; महाभारत युद्ध रचवाया।
द्रुपद-सुता का चीर बढ़ाया; गर्भ में जलते परीक्षित को बचाया।
कच्छप, मत्स्य, वराह, शेष; वामन, कल्कि, बुद्ध, मुनीश्वर।
नृसिंह होकर प्रह्लाद उबारा; राम रूप धरकर रावण मारा।
मधु-कैटभ दैत्य-हंता की जय; अंबरीष के प्रिय, चक्रधारी।
व्याध-अजामिल को तारा; शबरी और गणिका जैसी नारियों को।
गरुड़ासन, गज के फंद काटने वाले; दर्शन दो, ध्रुव के नयनानंदन।
शुद्ध संतों का संग दो; प्रेम-भक्ति का रस-रंग बढ़े।
दिव्य वृंदावन का वास दो; मृगतृष्णा और जग-आशा छूटे।
शिव-नारद तुम्हारा ध्यान धरते हैं; शुक-सनकादि ब्रह्मज्ञानी।
जय-जय राधारमण कृपालु; समस्त संकट-भ्रम-जाल हरने वाले।
विघ्न-रोग-भारी दुख नष्ट होते हैं, जो जगपति गिरधारी का स्मरण करते हैं।