चालीसा

कृष्ण चालीसा

परिचय

भगवान कृष्ण को समर्पित एक अन्य प्रचलित चालीसा का संपूर्ण पाठ, प्रत्येक पंक्ति के अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ सहित। यह “बांके बिहारी” पाठ श्री कृष्ण चालीसा (“बंशी शोभित”) से भिन्न रचना है। संस्करणों में वर्तनी के छोटे अंतर मिल सकते हैं।

आरंभिक दोहा

बांके बिहारी कृष्ण को, जो कोई ध्यावे नित्य।

उसके सब संकट कटैं, दुख हरे अखिल अनित्य॥

पाठ

जय श्री कृष्ण मुकुंद मुरारी। जय गोपाल गिरिधर बनवारी॥

जय नंद नंदन ब्रज राज राजा। जय जय यदु कुल केरे ताजा॥

जय जय द्वारकाधीश दयाला। जय मथुरानाथ गोपाला॥

नंदगांव में आनंद भयो। जब वसुदेव का नंदन जयो॥

माता देवकी के हितकारी। कंस का काल बने भवतारी॥

वसुदेव तुमको ले गए गोकुल। नंद के आनंद बढ़े अतिकुल॥

गोकुल में तुमने लील रचायो। नंद बाबा को परम सुख पायो॥

पूतना को मार गिरायो। शकटासुर का प्राण हरायो॥

तृणावर्त को तुम संहारयो। माता यशोदा को सुख दायो॥

माखन चोरी की लीला कीन्ही। ग्वालन संग बाल क्रीड़ा कीन्ही॥

मुख में विश्व दिखायो माता। सब देखी अति विस्मय ग्याता॥

दधि माखन नवनीत चुरायो। ऊखल बंध तुम लीला दिखायो॥

यमलार्जुन को तुमने तारा। नल कुबर का उद्धार किया सारा॥

ब्रज में गोधन चराने जाते। ग्वालबाल संग बंसी बजाते॥

कालिया नाग का मान उतारा। फण पर नृत्य किया मनहारा॥

यमुना जल को निर्मल कीना। ब्रजवासी सब को सुख दीना॥

धेनुकासुर को तुम वध कीना। बकासुर का भी अंत किया दीना॥

प्रलंबासुर को मारा बलदाऊ। कृष्ण सहायक भैया हलधर नाऊं॥

गोवर्धन पर्वत को धारयो। इन्द्र का मान भी तुम उतारयो॥

सात दिवस अंगुली पर धारा। ब्रज के जन जन को तुम उबारा॥

इन्द्र आए शरण तुम्हारी। हुई गोविंद पदवी अति प्यारी॥

गोपियन संग रास रचायो। महारास में प्रेम बढ़ायो॥

बंसी बजाकर सबको मोहा। तुम बिन गोपिन को नहीं सोहा॥

राधा रानी को प्रेम दियो तुम। वृन्दावन की शोभा बढ़ायो तुम॥

कंस का अंत करायो धाई। मथुरा जन को मुक्ति दिलाई॥

उग्रसेन को राज दिलायो। माता देवकी को सुख पायो॥

संदीपनी गुरु की सेवा कीन्ही। विद्या चौसठ कला सब लीन्ही॥

द्वारका पुरी बसायो सुन्दर। रुक्मिणि हरण किया अति मनहर॥

सोलह सहस रानी के स्वामी। सबके हृदय के अन्तर्यामी॥

नरकासुर को तुमने मारा। बंदी रानी सबको उबारा॥

सुदामा की लाज बचाई। दीन दयालु तुम सच्चे भाई॥

तनिक चिउरा जो सुदामा ल्याए। महल अटारी तुम उनको दिलाए॥

पाण्डव हित तुमने सब कीना। द्रौपदी को चीर अमित दीना॥

अर्जुन को तुमने गीता सुनाई। धर्म की राह सबको दिखलाई॥

विश्वरूप अर्जुन को दिखलाया। दिव्य ज्ञान का दान सुनाया॥

कर्म योग का ज्ञान बताया। निष्काम भाव से कर्म सिखाया॥

भीष्म विदुर को गति दिलवाई। धर्म स्थापन हित लीला रचाई॥

जरासंध का किया तुम अंत। शिशुपाल वध भी किया भगवंत॥

अधर्म मिटाकर धर्म बढ़ायो। सत्य अहिंसा का मार्ग दिखायो॥

कृष्ण चालीसा जो नित गावै। सब सुख सम्पत्ति घर में पावै॥

समापन दोहा

कृष्ण चालीसा पढ़े जो, नित्य करे गुणगान। उन पर कृपा करे प्रभु, दे सुख और कल्याण॥ कृष्ण कृपा जासु पर होई। ताको सुख दुख सकत न कोई॥

अर्थ

श्री कृष्ण मुकुंद मुरारी की जय; गोपाल गिरिधर बनवारी की जय।

नंदनंदन, ब्रज-राज-राजा की जय; यदुकुल के ताज की जय-जय।

द्वारकाधीश दयालु की जय-जय; मथुरानाथ गोपाला की जय।

जब वसुदेव-नंदन का जन्म हुआ, नंदगाँव में आनंद छा गया।

माता देवकी के हितकारी; कंस के काल, भवतारी बने।

वसुदेव तुम्हें गोकुल ले गए; नंद का आनंद अतिशय बढ़ा।

गोकुल में लीला रचाई; नंद बाबा को परम सुख दिया।

पूतना को मार गिराया; शकटासुर के प्राण हरे।

तृणावर्त का संहार किया; माता यशोदा को सुख दिया।

माखन-चोरी की लीला की; ग्वालों संग बाल-क्रीड़ा की।

मुख में विश्व दिखाया, हे माता; देखकर सब अति विस्मित हुए।

दही-माखन-नवनीत चुराया; ऊखल से बँधकर लीला दिखाई।

यमलार्जुन को तारा; नल-कूबर का पूरा उद्धार किया।

ब्रज में गोधन चराने जाते; ग्वाल-बाल संग बंसी बजाते।

कालिया नाग का मान उतारा; फण पर मनोहर नृत्य किया।

यमुना-जल निर्मल किया; सब ब्रजवासियों को सुख दिया।

धेनुकासुर का वध किया; बकासुर का भी अंत किया।

प्रलंबासुर को बलदाऊ ने मारा; कृष्ण के सहायक भैया हलधर नाम वाले।

गोवर्धन पर्वत धारण किया; इंद्र का मान भी उतारा।

सात दिन अंगुली पर धारण किया; ब्रज के जन-जन को उबारा।

इंद्र तुम्हारी शरण आए; गोविंद पदवी अति प्यारी हुई।

गोपियों संग रास रचाया; महारास में प्रेम बढ़ाया।

बंसी बजाकर सबको मोहा; तुम्हारे बिना गोपियों को कुछ नहीं सुहाता।

राधा रानी को प्रेम दिया; वृंदावन की शोभा बढ़ाई।

धाकर कंस का अंत कराया; मथुरा-जनों को मुक्ति दिलाई।

उग्रसेन को राज दिलाया; माता देवकी को सुख दिया।

संदीपनि गुरु की सेवा की; चौंसठ कला-विद्या सब लीं।

सुंदर द्वारका पुरी बसाई; अति मनोहर रुक्मिणी-हरण किया।

सोलह सहस्र रानियों के स्वामी; सबके हृदय के अंतर्यामी।

नरकासुर को मारा; बंदी रानियों को उबारा।

सुदामा की लाज बचाई; दीन-दयालु सच्चे भाई।

सुदामा जो तनिक चिउरा लाए, उसके बदले महल-अटारी दिलाए।

पांडवों के हित सब किया; द्रौपदी को अमित चीर दिया।

अर्जुन को गीता सुनाई; सबको धर्म की राह दिखाई।

अर्जुन को विश्वरूप दिखाया; दिव्य ज्ञान का दान सुनाया।

कर्मयोग का ज्ञान बताया; निष्काम भाव से कर्म सिखाया।

भीष्म-विदुर को गति दिलाई; धर्म-स्थापना हेतु लीला रचाई।

जरासंध का अंत किया; शिशुपाल का वध भी किया, हे भगवंत।

अधर्म मिटाकर धर्म बढ़ाया; सत्य-अहिंसा का मार्ग दिखाया।

जो नित्य कृष्ण चालीसा गाता है, वह घर में सब सुख-संपत्ति पाता है।