चालीसा

काली माता चालीसा

परिचय

माँ काली को समर्पित प्रचलित चालीसा का संपूर्ण पाठ, प्रत्येक पंक्ति के अंग्रेज़ी अर्थ और हिंदी भावार्थ सहित। यह पाठ प्रचलित मुद्रित परंपरा के अनुसार है; संस्करणों में वर्तनी के छोटे अंतर मिल सकते हैं।

आरंभिक दोहा

जयकाली कलिमलहरण, महिमा अगम अपार।

महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार॥

पाठ

अरि मद मान मिटावन हारी। मुण्डमाल गल सोहत प्यारी॥

अष्टभुजी सुखदायक माता। दुष्टदलन जग में विख्याता॥

अष्टम कर भक्तन वर दाता। जग मनहरण रूप ये माता॥

भक्तन में अनुरक्त भवानी। निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी॥

महशक्ति अति प्रबल पुनीता। तू ही काली तू ही सीता॥

पतित तारिणी हे जग पालक। कल्याणी पापी कुल घालक॥

कलि के कष्ट कलेशन हरनी। भव भय मोचन मंगल करनी॥

महिमा अगम वेद यश गावैं। नारद शारद पार न पावैं॥

भू पर भार बढ्यौ जब भारी। तब तब तुम प्रकटीं महतारी॥

आदि अनादि अभय वरदाता। विश्वविदित भव संकट त्राता॥

कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा। उसको सदा अभय वर दीन्हा॥

ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा। काल रूप लखि तुमरो भेषा॥

कलुआ भैंरों संग तुम्हारे। अरि हित रूप भयानक धारे॥

सेवक लांगुर रहत अगारी। चौसठ जोगन आज्ञाकारी॥

त्रेता में रघुवर हित आई। दशकंधर की सैन नसाई॥

खेला रण का खेल निराला। भरा मांस-मज्जा से प्याला॥

रौद्र रूप लखि दानव भागे। कियौ गवन भवन निज त्यागे॥

तब ऐसौ तामस चढ़ आयो। स्वजन विजन को भेद भुलायो॥

ये बालक लखि शंकर आए। राह रोक चरनन में धाए॥

तब मुख जीभ निकर जो आई। यही रूप प्रचलित है माई॥

बाढ्यो महिषासुर मद भारी। पीड़ित किए सकल नर-नारी॥

करूण पुकार सुनी भक्तन की। पीर मिटावन हित जन-जन की॥

तब प्रगटी निज सैन समेता। नाम पड़ा मां महिष विजेता॥

शुंभ निशुंभ हने छन माहीं। तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं॥

मान मथनहारी खल दल के। सदा सहायक भक्त विकल के॥

दीन विहीन करैं नित सेवा। पावैं मनवांछित फल मेवा॥

संकट में जो सुमिरन करहीं। उनके कष्ट मातु तुम हरहीं॥

प्रेम सहित जो कीरति गावैं। भव बन्धन सों मुक्ती पावैं॥

काली चालीसा जो पढ़हीं। स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं॥

दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा। केहि कारण मां कियौ विलम्बा॥

करहु मातु भक्तन रखवाली। जयति जयति काली कंकाली॥

सेवक दीन अनाथ अनारी। भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी॥

समापन दोहा

प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ। तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥

अर्थ

शत्रुओं के मद-मान मिटाने वाली; गले में प्यारी मुंडमाला शोभती है।

अष्टभुजी, सुख देने वाली माता; दुष्टों का दलन करने वाली, जग में विख्यात।

आठवें हाथ से भक्तों को वर देने वाली; जग का मन हरने वाला रूप है माता का।

भक्तों से प्रेम करने वाली भवानी; ऋषि-मुनि-ज्ञानी निशदिन रटते हैं।

महाशक्ति, अत्यंत प्रबल, पवित्र; तू ही काली है, तू ही सीता है।

पतितों को तारने वाली, जग का पालन करने वाली; कल्याणी, पापी कुलों का नाश करने वाली।

कलि के कष्ट-कलेश हरने वाली; भव-भय से छुड़ाने वाली, मंगल करने वाली।

अगम महिमा का वेद यश गाते हैं; नारद-शारदा पार नहीं पाते।

पृथ्वी पर जब भार बहुत बढ़ा, तब-तब तुम प्रकट हुईं, हे माता।

आदि-अनादि, अभय वर देने वाली; विश्वविख्यात भव-संकट से तारने वाली।

बुरे समय में जिसने तुम्हारा नाम लिया, उसे सदा अभय वर दिया।

श्रुति, शेष, सुरेश ध्यान धरते हैं, तुम्हारा काल-रूप देखकर।

कलुआ भैरव तुम्हारे साथ हैं; शत्रुओं के लिए भयानक रूप धारण किए।

सेवक लांगुर आगे रहते हैं; चौंसठ जोगिनियाँ आज्ञाकारी हैं।

त्रेता में रघुवर के हित आईं; दशकंधर की सेना नष्ट की।

रण का निराला खेल खेला; मांस-मज्जा से प्याला भरा।

रौद्र रूप देखकर दानव भागे; अपने भवन त्यागकर चले गए।

तब ऐसा तमस चढ़ आया कि अपनों-परायों का भेद भूल गया।

यह बाल-लीला देखकर शंकर आए और राह रोककर चरणों में लेट गए।

तब मुख से जीभ निकल आई — हे माई, यही रूप प्रसिद्ध है।

महिषासुर का मद बहुत बढ़ा; समस्त नर-नारियों को पीड़ित किया।

भक्तों की करुण पुकार सुनी, जन-जन की पीड़ा मिटाने हेतु।

तब अपनी सेना सहित प्रकट हुईं; नाम पड़ा — महिष-विजेता माँ।

शुंभ-निशुंभ क्षण भर में मारे; तुम्हारे समान जग में दूसरा कोई नहीं।

दुष्ट दल के मान का मंथन करने वाली; व्याकुल भक्तों की सदा सहायिका।

दीन-हीन नित्य सेवा करते हैं और मनवांछित फल पाते हैं।

संकट में जो स्मरण करते हैं, उनके कष्ट हे मातु तुम हरती हो।

प्रेम सहित जो कीर्ति गाते हैं, वे भव-बंधन से मुक्ति पाते हैं।

जो काली चालीसा पढ़ते हैं, वे बिना बंधन स्वर्गलोक चढ़ते हैं।

दया-दृष्टि से देखो हे जगदंबा; हे माँ, देर क्यों की?

हे मातु, भक्तों की रखवाली करो; जय-जय काली कंकाली।

दीन-अनाथ सेवक भक्तिभाव से तुम्हारी शरण में हैं।