चालीसा
बाबा गंगाराम चालीसा
परिचय
संत बाबा गंगाराम को समर्पित चालीसा-पाठ का परिचय। क्षेत्रीय संत-परंपरा में इनकी मान्यता है; पाठ-परंपराओं में शब्द भिन्न हो सकते हैं। यहाँ दिया गया पाठ एकमात्र उपलब्ध ऑनलाइन संस्करण से पुनर्निर्मित है, जिसमें दो स्थानों पर त्रुटि है; पाठ-संशोधन से पहले किसी विश्वसनीय मुद्रित संस्करण से मिलाएँ।
आरंभिक दोहा
अलख निरंजन आप हैं,
निरगुण सगुण हमेश।
पाठ
गंगाराम देव हितकारी, वैश्य वंश प्रकटे अवतारी।
पूर्वजन्म फल अमित रहेऊ, धन्य धन्य पितु मातु भयेउ।
उत्तम कुल उत्तम सतसंगा, पावन नाम रात अरू गंगा।
बाबा नाम परम हितकारी, सत सत वर्ष सुमंगलकारी।
बीतहि जन्म देह सुध नाही, तपत तपत पुनि भयेऊ गुसाई।
जो जन बाबा में चित लावा, तेहिं परताप अमर पद पावा।
नगर झुंझनूं धाम तिहारो, शरणागत के संकट टारो।
धरम हेतु सब सुख बिसराये, दीन हीन लखि हृदय लगाये।
एहि विधि चालीस वर्ष बिताये, अन्त देह तजि देव कहाये।
देवलोक भई कंचन काया, तब जनहित संदेश पठाया।
निज कुल जन को स्वप्न दिखावा, भावी करम जतन बतलावा।
आपन सुत को दर्शन दीन्हों, धरम हेतु सब कारज कीन्हों।
नभ वाणी जब हुई निशा में, प्रकट भई छवि पूर्व दिशा में।
जिमि जनहित प्रकटेउ सब ईशा।
चमत्कार एहि भांति दिखाया, अन्तरध्यान भई सब माया।
सत्य वचन सुनि करहिं विचारा, मन महँ गंगाराम पुकारा।
जो जन करई मनौती मन में, बाबा पीर हरहिं पल छन में।
ज्यों निज रूप दिखावहिं सांचा, त्यों त्यों भक्तवृन्द तेहिं जांचा।
उच्च मनोरथ शुचि आचारी, नाम के अटल पुजारी।
जो नित गंगाराम पुकारे, बाबा दुख से ताहिं उबारे।
बाबा में जिन्ह चित्त लगावा, ते नर लोक सकल सुख पावा।
परहित बसहिं जाहिं मन मांही, बाबा बसहिं ताहिं तन मांही।
धरहिं ध्यान रावरो मन में, सुखसंतोष लहै न मन में।
धर्म वृक्ष जेही तन मन सींचा, पार ब्रह्म तेहि निज में खीचा।
गंगाराम नाम जो गावे, लहि बैकुंठ परम पद पावे।
बाबा पीर हरहिं सब भांति, जो सुमरे निश्छल दिन राती।
दीन बन्धु दीनन हितकारी, हरौ पाप हम शरण तिहारी।
पंचदेव तुम पूर्ण प्रकाशा, सदा करो संतन मँह बासा।
का पानी, गंगाराम उभय सुनिशानी।
कृपासिंधु तुम हो सुखसागर, सफल मनोरथ करहु कृपाकर।
झुंझनूं नगर बड़ा बड़ भागी, जहँ जन्में बाबा अनुरागी।
पूरन ब्रह्म सकल घटवासी, गंगाराम अमर अविनाशी ।
ब्रह्म रूप देव अति भोला, कानन कुण्डल मुकुट अमोला।
नित्यानन्द तेज सुख रासी, हरहु निशातन करहु प्रकाशी।
गंगा दशहरा लागहिं मेला, नगर झुंझनूं मँह शुभ बेला।
जो नर कीर्तन करहिं तुम्हारा, छवि निरखि मन हरष अपारा।
प्रातः काल ले नाम तुम्हारा, चौरासी का हो निस्तारा।
पंचदेव मन्दिर विख्याता, दरशन हित भगतन का तांता।
जय श्री गंगाराम नाम की, भवतारण तरि परम धाम की।
समापन दोहा
सुने सुनावे प्रेम से, कीर्तन भजन सुनाम। मन इच्छा सब कामना, पूरई गंगाराम ॥
अर्थ
हे गंगाराम देव! आप सबके हितकारी हैं; वैश्य कुल में अवतरित हुए हैं।
पूर्व जन्मों का फल अपार रहा; माता-पिता धन्य हुए।
उत्तम कुल और उत्तम सत्संग; पवित्र नाम और गंगा जी।
बाबा नाम अत्यंत हितकारी है; यह सदा सुमंगल करने वाला है।
जन्म बीत गया, शरीर की सुध न रही; तप करते-करते फिर ईश्वर प्राप्त हुए।
जो जन बाबा में मन लगाए, उसने उनके तेज से अमर पद पाया।
आपका नगर झुंझनूं और धाम वही है; शरणागतों के संकट दूर करते हैं।
धर्म हेतु सब सुख भुला दिए; दीन-हीन को देखकर हृदय से लगा लिया।
इस प्रकार चालीस वर्ष बिताए; अंत में शरीर त्याग कर देव कहलाए।
देवलोक में कंचन काया हुई; तब जनहित का संदेश भेजा।
अपने कुलजनों को स्वप्न में दर्शन दिए और भावी कर्म का उपाय बताया।
अपने पुत्र को दर्शन दिए और धर्म हेतु सब कार्य किए।
जब रात में आकाशवाणी हुई, पूर्व दिशा में आपकी छवि प्रकट हुई।
जैसे ईश्वर सबके हित हेतु प्रकट हुए।
इस प्रकार चमत्कार दिखाया; अंतर्ध्यान में सारी माया दूर हो गई।
सत्य वचन सुनकर विचार किया; मन में गंगाराम ने पुकारा।
जो जन मन में मनौती करे, बाबा पीर पल छिन में दूर कर देते हैं।
जैसे वे अपने सच्चे रूप दिखाते हैं, वैसे ही भक्तवृंद की जाँच करते हैं।
उन्नत मनोरथ और शुचिचरित्र; नाम के अटल पुजारी।
जो नित्य गंगाराम पुकारता है, बाबा उसे दुख से उबारते हैं।
जिन्होंने बाबा में चित्त लगाया, वे नर लोक के समस्त सुख पाए।
जिसके मन में परहित बसता है, बाबा उसी तन में निवास करते हैं।
राव ईश्वर के मन में ध्यान धरो; सुख-संतोष उसके बिना नहीं मिलता।
जिसके तन-मन को धर्म-वृक्ष से सींचा, पारब्रह्म ने उसे अपने में खींच लिया।
जो गंगाराम नाम गाता है, वह बैकुंठ परम पद पाता है।
बाबा पीर हर प्रकार के दुख हरते हैं, जो निष्छल होकर दिन-रात स्मरण करे।
दीनों के बंधु और दीनों के हितकारी; हमारे पाप हरो, हम आपकी शरण में हैं।
आप पंचदेव हैं, पूर्ण प्रकाश स्वरूप; सदा संतों के मध्य निवास करो।
यह पंक्ति स्रोत संस्करण में अधूरी है; गंगाराम उभय (दोनों लोकों) की सुनिश्चित निशानी हैं।
आप कृपासिंधु और सुखसागर हैं; कृपाकर होकर मनोरथ सफल करो।
झुंझनूं नगर बड़ा भाग्यवान है, जहाँ बाबा अनुरागी का जन्म हुआ।
पूर्ण ब्रह्म, जो सब घटों में वास करते हैं; गंगाराम अमर और अविनाशी हैं।
ब्रह्मरूप, अत्यंत भोले देव; कानों में कुंडल और अमोली मुकुट धारण किए।
नित्यानंद के तेज और सुख के भंडार; हमारा अंधकार हरो और प्रकाशित करो।
गंगा दशहरा का मेला लगता है; झुंझनूं नगर में शुभ बेला आती है।
जो नर आपका कीर्तन करे, आपकी छवि निहारकर मन अपार हर्षित होता है।
प्रातःकाल आपका नाम लेने से चौरासी लाख योनियों का निस्तार हो जाता है।
पंचदेव मन्दिर विख्यात है; दर्शन हेतु भक्तों का तांता लगा रहता है।
श्री गंगाराम नाम की जय; उस परम धाम की जय जो संसार से पार लगाता है।